प्राचीन भारतीय इतिहास में हर्ष के स्थान का मूल्यांकन कीजिए।

 प्राचीन भारतीय इतिहास में हर्ष के स्थान का मूल्यांकन कीजिए। 

 Assess Harsha’s Position in Ancient Indian History.

(5) बौद्ध धर्म का महान् प्रचारक – 

आरम्भ में अशोक की तरह वह भी पहले हिन्दू 5 को मानता था । बाण के हर्षचरित से पता चलता है कि शशांक के विरुद्ध अभियान शुरू ने से पहले हर्ष ने शिव की पूजा की थी । ह्वेनसांग के विवरण से यह भी पता चलता है। कि वह अन्त तक सूर्योपासना भी करता रहा। प्रयाग सम्मेलन में वह शिव, बुद्ध तथा सूर्य तीनों) की पूजा करता था परन्तु धीरे- धीरे वह बौद्ध महात्मा दिवाकर मित्र (जिससे हर्ष की भेंट विन्ध्या प्रदेश में उस समय हुई थी जब कि वह अपनी बहिन राज्यश्री को ढूंढ रहा था ।) तथा बाद में ह्वेनसांग के सम्पर्क से वह महायान बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। हर्ष को बौद्ध अनुयायी बनाने में बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र, उसकी बहिन राज्यश्री तथा चीनी यात्री हेनसांग का विशेष हाथ था । डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी का कथन है कि “अपने बाद के दिनों में हर्ष बौद्ध धर्म की ओर अधिकाधिक आकृष्ट होता चला गया और अन्त में सम्भवतः ह्वेनसांग के असाधारण निरूपण तथा अपनी बौद्ध बहिन राज्यश्री से प्रभावित होकर प्रायः बौद्ध हो गया।” उसने कन्नौज में एक महायान सम्प्रदाय का सम्मेलन बुलाया जिसमें हजारों बौद्ध विद्वानों तथा ब्राह्मणों ने हिस्सा लिया। डॉ. राजबली पाण्डेय लिखते हैं कि “ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से ज्ञात होता है कि वह बौद्ध धर्म की ओर झुका हुआ था । ऐसा जान पड़ता है कि बौद्ध धर्म से वह अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रभावित हुआ था, यद्यपि मरकारी, कागज पत्रों में अपने को माहेश्वर (शैव) ही घोषित करता था।

बौद्ध धर्म प्रचारक

कन्नौज में आयोजित धर्म सभा का जो वर्णन ह्वेनसांग करता है उसके अनुसार हर्ष वैदिक, पौराणिक, बौद्ध, जैन आदि सभी धर्मों का आदर करता था। सभी सम्प्रदायों के पण्डित उसमें आमन्त्रित थे और सभी सम्प्रदायों के देवताओं की मूर्तियाँ उसमें स्थापित और पूजित हुई थी; फिर भी बौद्ध प्रतिमा की स्थापना सबसे पहले दिन करके उसने बौद्ध धर्म के प्रति सबसे अधिक आस्था प्रकट की थी । धार्मिक मला में वह उदार था और प्राचीन भारतीय राजाओं की उदार धर्म नीति का ही उसने अवलम्बन किया था ।”

हर्ष ने महायान संप्रदाय के प्रचार के उद्येश्य से ही कन्नौज में 643 ई. में धार्मिक सभा का आयोजन किया। इस सभा में 18 देशों के राजा, 3000 ब्राह्मण और जैन 3000 महायानी” और हीनयानी बौद्ध भिक्ष तथा नालन्दा महाविहार के 1000 भिक्षुओं ने भाग लिया। अशक की भांति हर्ष ने भी बौद्ध धर्म के लिए अथक प्रयास किये । हर्ष के समय में नालन्दा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा केन्द्र था। हर्ष ने उसको दान दिया। हर्ष ने पशुवध तथा मांस भक्षण निषिद्ध कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रचार के उसने महासभायें तथा अधिवेशन बुलवाये। उसका झुकाव महायान बौद्ध की ओर था। होने पर भी उसने अशोक के समान बौद्ध का प्रचार नहीं किया तथा राज्य की सारी शक्ति को बौद्ध धर्म के प्रचार में नहीं लगाया। |

 (6) महान् साहित्य प्रेमी तथा विद्यानुरागी – 

हर्ष महान् साहित्यानुरागी था। हो । ए. स्मिथ के अनुसार हर्ष न केवल योग्य साहित्यकारों का उदार आश्रयदाता था वरन् । स्वयं भी एक उच्च कोटि का लेख विशारद तथा सुविख्यात लेखक था।” उसने नागानन्द रत्नावली तथा प्रियदर्शिका नामक तीन ग्रंथों की रचना की। वह विद्वान तथा लेखकों का आश्रयदाता भी था। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी का कथन है कि हर्ष के स्मरणीय होने का एक कारण यह है कि वह विद्वानों का उदार आश्रयदाता था। परन्तु हर्ष केवल विद्वानों का आश्रयदाता मात्र ही न था वरन् उसने स्वयं की अपनी लेखनी का प्रयोग उसी कौशल के साथ किया, जिस कौशल के साथ उसने अपनी तलवार का प्रयोग किया था। बाण ने अपने ग्रंथ हर्षचरित में हर्ष की एक कवि के रूप में प्रशंसा करते हुए लिखा है कि उसकी कविता की प्रशस्ति शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती और वह अपने काव्यों तथा कथानकों में अमृत की वर्षा किया करता था।” ग्यारहवीं शताब्दी के सोढ्ढल नामक लेखक ने हर्ष को केवीनु की उपाधि से विभूषित किया है। हर्ष न केवल कुशल कवि वरन् एक कुशल नाटककार भी था। हर्ष प्रियदर्शिका, रत्नावली और नागानन्द नामक नाटकों की रचना की। इसके अतिरिक्त हर्ष ने एक व्याकरण तथा दो बौद्ध कविताओं की भी रचना की थी। इस तरह प्राचीन भारत के विद्वानों में हर्ष को एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है।

हर्ष के दरबारी कवि

 हर्ष के दरबार में बाणभट्ट, मयूर, मातंग दिवाकर आदि विद्वान् आश्रय प्राप्त थे। बाणभट्ट ने हर्षचरित तथा कादम्बरी नामक ग्रन्थों की रचना की । इसके अतिरिक्त उसे चण्डी शतक तथा पार्वती परिणय नामक ग्रंथों का रचयिता भी माना जाता है। मयूर भी हर्ष के दरबार का प्रसिद्ध विद्धान् था उसने मयूर शतक, सूर्य शतक, खण्ड प्रशस्ति आदि ग्रंथों की रचना की । मातंग दिवाकर भी हर्ष के दरबार को सुशोभित करता था। कहा जाता है कि मातंग दिवाकर चाण्डाल था, परन्तु अपनी कवित्व शक्ति के कारण वह बाण और मयूर के समान हर्ष के दरबार में सम्मानित था। हर्ष अपनी आय का चौथाई भाग विद्वानों एवं साहित्यकारों की सहायता के लिए खर्च करता था। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् जयसेन को हर्ष ने 80 गाँव देने का प्रस्ताव रखा था। उसे त्यागी विद्वान् ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया पर यह प्रस्ताव हर्ष की साहित्यिक अभिरुचि को तो अवश्य ही बताता है । शिक्षा प्रसार में भी हर्ष की बड़ी रुचि थी। उसने अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करवाई थी तथा बड़ी उदारतापूर्वक उनकी आर्थिक सहायता भी की। उसने 100 गाँवों की आमदनी नालन्दा विश्वविद्यालय को प्रदान कर दी। डॉ. राजबली पाण्डेय का कथन है कि “हर्ष के समय में भारत वर्ष अपनी विद्या दान और साहित्य के लिए प्रसिद्ध था । बाहर के लोग भी अपनी ज्ञान पिपासा तृप्त करने के लिए इस देश में आते थे । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पश्चिम में कपिला, गान्थार से लेकर पूर्व में बंगाल और उदर ८४२ द्र, अनेछ बौद्ध र और संधारण देखे जो विद्या और शिक्षा के केन्द्र थे । |

एक महान् दानी के रूप में 

– हर्ष को इसलिए महान् ४ जाता है या वह द्रण की रवीर था। वह हर पांचवें वर्ष में प्रयाग में एक र छाता था और इस्पर्धं वह इनमें इकट्टी होने वाली सम्यक्ति को दीन दुरिद्रयों तथा यी को बाँट दिया करता । 643-644 में हुए ने प्रयाग में पंचवर्षीय दान महोत्सब का आयोजन किया । एक – सभा में (643 में) चीनी यात्री हेनर जहाँ स्वयं उपस्थित था न लिग्ना है कि दीन काल से यह प्रथा चली आ रही है कि राजे- हार तथा अन्य धनी व्यक्ति जब प्रयाग) आत हैं तो वे अपना घट्यूः धन दान छ, रूप में दे डालते हैं। 

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