शिक्षा, अनुसंधान, लेखन एवं पठन-पाठन में जनमानस की असाधारण अभिरूचि

शिक्षा, अनुसंधान, लेखन एवं पठन-पाठन में जनमानस की असाधारण अभिरूचि

इसका प्रमुख कारण शिक्षा, अनुसंधान, लेखन एवं पठन-पाठन में जनमानस की असाधारण अभिरूचि रहा है । इस बीच विभिन्न स्तरों पर अनेक शिक्षण संस्थाओं, अनुसंधान प्रयोगशालाओं, प्रकाशन गृहों, मुद्राणालयों की स्थापना हुई है । इन संस्थाओं से जुड़े व्यक्तियों द्वारा निरन्तर वाङ्गमय का सृजन किया जा रहा है । अनेक विषयों पर पुस्तकें रही प्रकाशित हो रही हैं । इन विषयों को उनके निरूपण के आधार पर निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जा सकता है: –
सरल वर्ग (Simple Class)
यौगिक वर्ग (Compound Class)
जटिल वर्ग (Complex Class)
अन्य शब्दों में कह सकते है कि विषय विश्लेषण उस विषय के विभिन्न आयामों को उजागर करने की क्रिया है । गठन एवं संरचना की दृष्टि से देखें तो 18वीं और 19वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक लिखित अधिकांश पुस्तकें सरल-वर्ग की श्रेणी में आती है। उनमें मुख्य वर्ग का प्रतिपादन/निरूपण किया गया है । उस समय के अधिकतर विषय एकांगी होते थे । पर जैसेजैसे ज्ञान के क्षेत्र में विकास हुआ उनमें नये-नये पहलू जुड़ने लगे । इन नये-नये पहलुओं/पक्षों ने यौगिक वर्गों को जन्म दिया । इस प्रकार विषय का गठन सरल से यौगिक और यौगिक से जटिल होता गया ।

2. पक्ष विश्लेषण 

विषय के विभिन्न पक्षों/पहलुओं को उनके अभिलक्षणों के आधार पर विभाजित करने की क्रिया को पक्ष विश्लेषण कहा जाता है । किसी भी विषय में उसके निहित पक्षों की पहचान के लिये ‘आज का समाज’ नामक पुस्तक को लीजिये । इस शीर्षक में दो प्रमुख पद है । एक ‘आज’ और दूसरा ‘समाज’ | पहला पद आज ‘काल’ का द्योतक है और दूसरा पद समाज ‘मुख्य वर्ग’ की अभिव्यंजना है । जिस प्रकार इस पुस्तक में मुख्य वर्ग के साथ ‘काल पक्ष’ का समावेश किया गया है, उसी प्रकार ऐसी पुस्तक भी हो सकती हैं जिनमें ‘काल पक्ष’ के साथसाथ ‘स्थान पक्ष, ‘उर्जा पक्ष’, ‘पदार्थ पक्ष’ एवं ‘व्यक्तित्व पक्ष’ का भी समावेश किया गया हो । यह भी सम्भव है कोई भी पक्ष एक से अधिक बार भी देखने को मिले । इस प्रकार की संस्थिति को स्तर (Level) की संज्ञा दी जाती है ।
यूनीवर्सल डैसीमल क्लैसिफिकेशन ने अपने 1895 में प्रकाशित संस्करण में ही कुछ ऐसे पदों को उनके अभिलक्षणों के आधार पर पहचान कर ली थी और उनके लिए अलग-अलग तालिकाओं की व्यवस्था की । इनके जोड़ने के लिए अलग-अलग प्रतीकों का प्रावधान किया । अपनी इस प्रकृति के कारण ही इस पद्धति को पक्षात्मक (Faceted) वर्गीकरण पद्धति माना जाता ।

विषयों को उनके निरूपण के आधार पर वर्गों में विभक्त करने की जानकारी देना,

 प्रमुख तालिकायें इस प्रकार है:
कोलन क्लैसिफिकेशन (1933) की संरचना उस समय की सबसे अधिक प्रचलित पद्धति इयूई डेसीमल क्लैसिफिकेशन से हटकर थी । इसमें ‘पक्षात्मकता’ सिद्धान्त का खुलकर प्रयोग किया गया था । डा. एस.आर. रंगनाथन ने विषयों को विभिन्न पक्षों में विभाजित कर विभिन्न क्रमों में देना अधिक ठीक समझा । पक्षों की इस अभिधारणा को उन्होंने मूलभूत श्रेणियों (Fundamental Categories) की संज्ञा दी । उनका मानना था किसी भी विषय में केवल पाँच और पाँच ही मूलभूत श्रेणियाँ हो सकती हैं । यदि किसी विषय में पाँच से अधिक ‘पद’ हैं। तो वे इन पाँच मूलभूत श्रेणियों में से ही किसी न किसी मूलभूत श्रेणी के किसी न किसी स्तर (Level) की अभिव्यक्ति होंगे । उदाहरण के लिए विलियम शेक्सपियर कृत मैकबेथ नाटक को ही लीजिए | इसका विश्लेषण करने पर हमें निम्नलिखित चार पक्ष प्राप्त होते है: भाषा पक्ष
|: अंग्रेजी रूप पक्ष
: नाटक लेखक पक्ष
: 1564 में जन्में विलियम शेक्सपियर कृति पक्ष
: मैकबेथ
ये चारों पक्ष व्यक्तित्व पक्ष की ही अभिव्यक्ति हैं । अन्य शब्दों में कह सकते हैं कि ये चार पक्ष मुख्य पक्ष व्यक्तित्व पक्ष के ही चार स्तर हैं । कोलन क्लैसिफिकेशन में मुख्य वर्ग “”0” का परिसूत्र इस प्रकार है:
[P], [P2] [P3], [P4]
– कृति कृतिकार
– रूप
भाषा
– साहित्य जिस-जिस विषय वर्ग में एक से अधिक व्यक्तित्व के पक्ष की अभिव्यक्ति की आवश्यकता है वहाँ इस प्रकार के पक्ष परिसूत्रों की परिकल्पना कर दी गई है । जैसे मुख्य वर्ग “a ग्रन्थ सूची” के लिये भी व्यक्तित्व पक्ष में चार स्तरों की पहचान की गई है, यह चार स्तर इस प्रकार है:
a [P], [P2] [P3], [P4]

विषय विश्लेषण क्रिया द्वारा विषय के विभिन्न पक्षों से अवगत कराना

सृजन वर्ष सृजन देश – ग्रंथ सूची का प्रकार ग्रंथ सूची की प्रकृति
मुख्य विषय यह आवश्यक नहीं की व्यक्तित्व पक्ष अपने आप को चार पक्षों में ही सदा, अभिव्यक्ति करे । चार से कम या चार से अधिक बार भी व्यक्तित्व पक्ष की अभिव्यक्ति के उदाहरण देखने में आते है । उदाहरण के लिए “ND मूर्तिकला’ के व्यक्तित्व पक्ष का पक्ष परिसूत्र मात्र तीन स्तरों का ही उल्लेख करता है:
|N [P], [P2] [P3]
वस्तुस्थिति काल – देश/शिल्प
मुख्य विषय इसी प्रकार वनस्पति शास्त्र के व्यक्तित्व पक्ष का परिसूत्र मात्र दो स्तरों का ही उल्लेख करता है । जैसे: पादप अंग पादप प्रकार
मुख्य वर्ग वनस्पति शास्त्र किसी-किसी मुख्य वर्ग में व्यक्तित्व पक्ष का एक ही स्तर गोचर होता है । उदारहरण के लिए मुख्य वर्ग “E’ रसायन शास्त्र’ को ही दीजिए । इसमें व्यक्तित्व पक्ष का मात्र एक ही स्तर है । इसका परिसूत्र इस प्रकार है: | [P] पदार्थ/द्रव्य
मुख्य वर्ग रसायन शास्त्र इसी प्रकार मुख्य वर्ग “L आयुर्विज्ञान’ में भी व्यक्तित्व पक्ष की अभिव्यक्ति केश एक ही स्तर पर की गई है । इसका पक्ष परिसूत्र इस प्रकार है: L [P]
मुख्य वर्ग आयुर्विज्ञान व्यक्तित्व पक्ष [P] के अतिरिक्त जिन चार पक्षों की परिकल्पना डा. एस.आर. ने की थी वे इस प्रकार हैं: [M] पदार्थ पक्ष [E] ऊर्जा पक्ष [S] देश/स्थान पक्ष [T] काल पक्ष
रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित इस, [P]; [M]; [E]. [S] [T] पक्ष परिसूत्र के अनुप्रयोग से दुष्कर विषय को भी सरलता से वर्गीकृत किया जा सकता है | [M] पदार्थ पक्ष
कोलन क्लैसिफिकेशन के छठे संस्करण में केवल कुछ ही मुख्य वर्गों में [M] पदार्थ पक्ष का प्रयोग किया गया है, जैसे 2 [P]; [M] ND [P], [P2] [P3]; [M] NQ [P], [P2] [P3]; [M]
इन उपर्युक्त चार मुख्य वर्गों में मुक्त भाव से पदार्थ पक्ष का प्रयोग किया गया है ।। लेकिन कुछ विषय वर्गों में इसका प्रयोग सीमित मात्रा में हुआ है । उदाहरण के लिये मुख्य वर्ग “X अर्थशास्त्र’ के व्यक्तित्व पक्ष के एकल ’61 मुद्रा’ के लिए ही [M] पक्ष का प्रावधान किया गया है । 

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