पदार्थ विधि के उदाहरणों को मुख्य वर्ग

पदार्थ विधि के उदाहरणों को मुख्य वर्ग 

इतना ही नहीं, मूलभूत श्रेणी [M] पदार्थ में भी अन्य कई परिवर्तन किये गये है। इन्हें क्रमशः
पदार्थ गुण Matter Property [MP] पदार्थ सामग्री Matter Material [MMt] पदार्थ विधि Matter Method [MM] के रूप में देखा जा सकता है । छठे संस्करण में अनेक उर्जा एकलों को पदार्थ गुण Matter Property [MP] में प्रतिस्थापित कर दिया गया है । उदाहरण के लिये मुख्य वर्ग “L आयुर्विज्ञान’ में Anatomy और Physiology को छठे संसकरण में मूलभूत श्रेणी [E] में दर्शाया गया है । जबकि ये दोनों अभिधारणायें पदार्थ गुण Matter Property [MP] को अभिव्यंजित कर रही हैं । अतः इन्हें सातवें संस्करण में उर्जा [E] पक्ष से हटाकर [MP] में प्रतिस्थापित कर दिया गया है । इसी प्रकार मुख्य वर्ग “J कृषि’ में मुद्रा (Soil), खाद (Manure) को छठे संस्करण में उर्जा [E] मूलभूत श्रेणी में रखा गया था । अब इन्हें वहाँ से हटाकर सातवें संस्करण में मूलभूत श्रेणी [MP] में प्रतिस्थापित कर दिया गया है जो तर्कसंगत भी जान पड़ता है । इन आधारभूत परिवर्तनों के फलस्वरूप [M] पदार्थ के एकलों की पहचान पहले की अपेक्षा अब अधिक सरल हो गई है । पदार्थ गुण, पदार्थ सामग्री एवं पदार्थ विधि की अभिकल्पना ने तो इस पक्ष के विश्लेषण को और भी सुगम और ग्राह्य बना दिया है । छठे संस्करण की सारणियों में दिये [E] उर्जा पक्ष के अधिकांश एकलों का स्वरूप अब सातवें संस्करण में [MP] पदार्थ गुण में प्रतिस्थापित कर दिया गया है ।
[MM] पदार्थ विधि के उदाहरणों को मुख्य वर्ग B1 Arithemetic, B2 Algebra, B3 Analysis, B6 Geometry, B6T Topology, F Technology, H Geology, J Agriculture, KX Animal Husbandary, N5 Drawing, Mysticism, X Economics में देखा जा सकता है ।

[MMt] पदार्थ सामग्री के उदाहरण मुख्य वर्ग

 F Technology, में By Product or waste product के रूप में देखे जा सकते हैं । मुख्य वर्ग GX जैव-रसायन, 1 वनस्पति शास्त्र और K प्राणिशास्त्र के पक्ष परिसूत्र में भी [MMt] पदार्थ सामग्री का प्रावधान किया गया है । इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी भी विषय में अब मूलभूत श्रेणी [M] की पहचान पहले जैसी कठिन प्रक्रिया नहीं रही है ।
[E] ऊर्जा पक्ष
व्यक्तित्व पक्ष [P] एवं पदार्थ पक्ष [M] की अपेक्षा उर्जा पक्ष [E] की पहचान अपेक्षाकृत सरल होती है । इसमें किसी भी प्रकार की गतिविधि (Action) का होना पाया जाता है । मुख्य वर्ग L आयुर्विज्ञान में सेवा सुश्रुशा (Nursing), उपचार (Treatment), निदान (Diagnosis) को [E] उर्जा पक्ष में रखा गया है । इसी प्रकार मुख्य वर्ग J कृषि में ‘जोतने’ (Ploughing) को, T शिक्षा में ‘अध्यापन (Teaching) को, Y समाज शास्त्र में सहायता कार्य (Relief work) को ऊर्जा पक्ष [E] में रखा गया है। ऐसा भी हो सकता है। कि किसी विषय में ऊर्जा [E] पक्ष की पुनरावृत्ति हो। यदि ऐसा हो तो उसे [2E] वितीय आवृति (2nd Round) की संज्ञा दी जायेगी। इसके लिये भी योजन चिन्ह : (कोलन) ही रहेगा।

[S] स्थान पक्ष

किसी भी विषय में स्थान पक्ष की पहचान नितान्त सरल होती है। किसी देश, प्रान्त, नगर, क्षेत्र आदि का नाम इस पक्ष की पहचान होती है। कोलन क्लैसिफिकेशन में स्थान पक्ष के चार स्तर (Level) गिनाये गये है जो इस प्रकार है:
राजनैतिक क्षेत्र (Political Division) प्राकृतिक आकृति (Physiological Features) Paent et (Orientation Division) रिहायशी क्षेत्र (Population Cluster)
इन सभी को एक दूसरे का स्तर प्राप्त है। इन्हें एक दूसरे में जोड़ने के लिये (बिन्दु) का प्रावधान है।

[T] काल पक्ष

विषय शीर्षक में काल/समय की पहचान अपेक्षाकृत अधिक सरल होती है। शताब्दी,सहस्त्राब्दि, दशक, वर्ष, ऋतु, माह, दिनांक, दिन, रात आदि का नाम हमें कालपक्ष का बोध कराने में सहायक होता है । कोलन क्लैसिफिकेशन में कालपक्ष को भी दो स्तरों में दिया गया है। दोनों के जोड़ने के लिये’ (अपौस्ट्रॉफी) चिन्ह का प्रयोग किया गया है लेकिन सदैव काल पक्ष सुस्पष्ट हो यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी लेखक “आधुनिक” (Modern), “प्राचीन” (Ancient), “मध्ययुगीन” (Medieval), जैसे शब्दों का प्रयोग भी कर देते है। ऐसी परिस्थिति में वर्गीकरणकार को काल निर्धारण करना पड़ता है। कभी-कभी व्यक्तियों एवं जाति-वंशों के नाम भी काल के अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं। जैसे : ‘अकबर के समय का भारत’, ‘मराठों का इतिहास’, इन दोनों उदाहरणों में काल पक्ष स्पष्ट नहीं है। वर्गीकरणकार को अन्य स्रोतों की सहायता से अकबर एवं मराठों का काल निर्धारण करना होगा।

3.पक्ष अनुक्रम (Facet Sequence) की अभिधारणायें।

किसी भी विषय का विश्लेषण करने पर हमें विभिन्न पक्षों के एकल पद प्राप्त होते हैं। यदि विषय ‘सरल’, वर्ग की श्रेणी में आता है तो उसमें पक्ष अनुक्रम की समस्या नहीं रहती। परन्तु यदि विश्लेषित विषय ‘यौगिक’ अथवा ‘जटिल’ प्रकार का है तो फिर पक्ष अनुक्रम निर्धारण आवश्यक हो जाता है। डा. एस.आर. रंगनाथन ने पक्ष अनुक्रम में व्यवस्था जाने के लिए कुछ अभिधारणाओं का प्रतिपादन किया है। इन अभिधारणाओं का ज्ञान हमें यौगिक एवं जटिल विषय के विभिन्न पहलुओं/पक्षों की पहचान करने में, अलग करने में एवं क्रम प्रदान करने में सहायक होता है। प्रोलिगोमिना टू लायब्रेरी क्लैसिफिकेशन के तृतीय संस्करण (1967) में इन अभिधारणाओं का समावेश किया गया है। ये अभिधारणायें एवं पक्ष अनुक्रम के सिद्धान्त इस प्रकार है:

3.1 प्रथम पक्ष की अभिधारणा (Postulate of first Facet)

एक ‘यौगिक’ अथवा ‘जटिल’ विषय के किस पक्ष को प्राथमिकता दी जाये इसका निर्धारण ‘प्रथम पक्ष की अभिधारणा’ में दिये निर्देश के अनुसार किया जाना चाहिए। इसके अनुसार मुख्य विषय ही मूलपक्ष होता है अतः उसी को सर्वप्रथम रखा जाना चाहिये। सहायक अनुक्रम सिद्धान्तों के अनुसार एक मूलपक्ष से जुड़े अन्य सभी पक्षों के एकलों को भी व्यवस्थित कर देना चाहिए।

3.2 मूर्तता ह्रास की अभिधारणा (Postulate of Decreasing Concretness)

| इस अभिधारणा का आशय यह है कि विषय में पाये जाने वाले विभिन्न पक्षों का क्रत मूर्त (Concrete) से अमूर्त (Abstract) की ओर होना चाहिए। अन्य शब्दों में कह सकते हैं। कि मूल पक्ष (Basic Facet) के उपरान्त सबसे पहले उस पक्ष को रखा जाये जो विषय में पाये जाने वाले अन्य पक्षों में सबसे अधिक मूर्त हो।

3.3 एक आवर्तन में पक्ष क्रम की अभिधारणा (Postulate of Facet Sequence within a round)

यदि किसी यौगिक विषय में व्यक्तित्व [P] पदार्थ [M] एवं ऊर्जा [E] पक्ष की उपस्थिति है तो उनका क्रम भी इसी अनुक्रम में होना चाहिए। उदाहरण के लिये “कपास की खेती के लिये भूमि की तैयारी” विषय को लीजिए। 

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