हर्ष का शासक, सैनिक नेता तथा कला एवं विद्याओं के संरक्षक के रूप में मूल्यांकन कीजिए।

हर्ष का शासक, सैनिक नेता तथा कला एवं विद्याओं के संरक्षक के रूप में मूल्यांकन कीजिए।

Form an estimate of Harsha as a ruler, Military leader and patron of art and learning.
हर्षवर्धन ने भी ने पूर्वज का अनुसरण करते हुए याच वर्ष में संचित कोष छ, दिन में वितरित कर दिया । प्रथम दिवस हर्ष ने भगवान बुद्ध की एक मूर्ति बनाळा अपने पद्मपूर्ण बहुमूल्य रल उस पर चढ दिये और तत्पश्चात् वहां के रहने वाले पुजारियों को भी दान दिया गया जो बाहर से का वहाँ रुके थे। हर्ष ने विद्यार्थियों, विधवा, अनाथ और दीन दुखियों को भी अपनी ८ सम्र में हिस्सा दिया। जब सम्राट के पास कुछ भी शेष न रहा। तब उसने अपना र जटित मुकुट और मुक्ताहार भी उतारा टान कर दिया। चीनी यात्री आगे लिखता है के इस प्रकार हर्ष ने सारे अभूध व वस्त्र तछ दान कर दिय तब अपनी बहन राज्यश्री से माँगकर एक पुराना वस्त्र पहना।” जब उत्पन्न प्राप्त हुआ तो हर्ष ने इच्छा प्रकट की “ईश्वर ने कि मैं आगामी जन्म जन्मान्तरों में भी पटा इसी भॉति अपने धन भण्डार को मानव जाति के धार्मिक रीति से दान दाता रहूं और इस प्रकार अपने को बुद्ध के दस बलों से सम्पन्न प्रया ३ टनोत्सव में हुई की दानशीलता और उसकी प्रजा के प्रति प्रेम की भावना 2 बोध होता है। डअर, एस. त्रिपाठी का कथन है कि “डा प्रकार हर्ष ने अपनी व्यक्तिगत, टनशीलता तथा उदारता का रिकार्ड स्थापित कर दिया है जिसका इतिहास में कोई अन्य दह नह हैं।”

(8) कला का पाघळ –

हर्ष एक छाला प्रेमी भी था । कन्नौज शहर स्वयं अपने आप में कल का एक अदभुत नमूना था । कई देव मन्दिर भी बने । उसके समय के कई कला के नमुन अउ श्री विद्यमान हैं। ताम्रपत्रों पर हुए छ, हुताक्षरों में उसकी लेखन कला के चातुर्य भाव मिलता है। प्रदेश के रामपुर जिले में सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर शाहाबाद में प्रभु के दादा टेश्वरी का प्रन्टिा भी हG युगीन है। हर्ष के काल में कई हिन्दू, बौद्ध तथा जैन मन्दिा तथा धर्तियां बड़ी संख्या में बनी 1 हर्ष ने नालन्टा में पीतल की चादर से ढा हु इद मठ बनवाया था। अजन्ता की कुछ कृतियां भी इसी काल की हैं।

प्रष्ट है कि हर्ष विद्या प्रमी, उदार, दानवीर, विद्वानों का संरक्षक, उद्यत मुल्यांकन ६३ अष्ट्रिय प्रजावाल व एक महान विजेता था। इसलिए प्राचीन भारत में उसका स्थान एवं रवाला है ? अाधुनिक इतिहासकार ती हर्ष की हिन्दू काल का अन्तिम महान् साम्राज्य निर्माता मानते हैं और कहते हैं कि हर्षवर्धन का शासन के महान काल था और उससे भारतीय इतिहास में एक नवीन युग का आरम्भ होता है। मजूमदार इन कथनों से अपनी असहमति व्यक्त करते हैं। पर वे भी इतना मानते हैं कि ” एक महान शासक, एक साहसी सैनिक नेता, ललित कलाओं और विद्वानों का संरक्षक एक विशेष व्यक्तित्व तथा सद्भावना वाले व्यक्ति के रूप में हम उसकी प्रशंसा और स करने से विमुख नहीं हो सकते ।”

| डॉ. आर. के. मुकर्जी के अनुसार “हर्षप्राचीन भारत के इतिहास के श्रेष्ठतम सम्राटों के से हैं ।उसमें समुद्रगुप्त तथा अशोक दोनो का सम्मिश्रण था। उसका जीवन हमें पूर्व की सैनिक सफलताओं और दसरे की पवित्रता की याद दिलाता है।”

हर्ष का मूल्यांकन

| डॉ. रामशरण के विचारानुसार “हर्ष के चरित्र में समुद्रगुप्त और अशोक दोनों के गुणों का समन्वय था। समुद्रगुप्त की भाँति विभिन्न दिशाओं में विजय करके उसने सम्राट का पद प्राप्त किया था तथा देश की ऐतिहासिक एकता को पुनः स्थापित किया। इसके उपरान्त युद्ध को सदा के लिए तिलांजलि देकर अशोक की भाँति अपनी सम्पूर्ण शक्ति को शान्ति स्थापना के कार्य में लगाया और देश की भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति में योग देकर उसके सांस्कृतिक व्यक्तित्व तथा महानता को विकसित किया ।” । डॉ. रतिभानुसिंह नाहर के अनुसार “गुप्तकाल और राजपूत युग के बीच का यह एक ऐसा महान् राजा है जिसने भारतवर्ष को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया । सत्य तो यह था कि वह भारतवर्ष का अन्तिम हिन्दू सम्राट था जिसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर एक छत्र राज्य किया।”

| डॉ. बैजनाथ शर्मा का कथन है कि “सम्राट हर्षवर्धन की गणना भारत के महानतम शासकों में होती है। योग्य और प्रेजारंजक शासक, दृढ निश्चयी और नीति कुशल शासक के रूप में हर्ष का अपना स्थान है हर्ष का उदय ऐसे समय हुआ जब उत्तर भारत की राजनीतिक दशा अत्यन्त शोचनीय थी। विघटन की प्रवृत्तियाँ तीव्र गति से देश की राजनीतिक एकता को छिन्न- भिन्न कर रही थी। उस समय हर्ष ने अपने अद्वितीय रण कौशल और पराक्रमी व्यक्तित्व से उत्तरी भारत को एक बार पुनः राजनीतिक एकता प्रदान करने का श्रेय अजित किया।”

हर्ष एक कुशल प्रशासक के रूप में –

| डॉ. एच. जी. राबिन्सन ने हर्ष का मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि “हर्ष एक विशिष्ट पुरुष था और भारत के महान् शासकों में उसका स्थान अशोक और अकबर के साथ है। सैनिक तथा प्रशासक, अद्वितीय प्रजापालक, साहित्य के संरक्षक और स्वयं एक सुयोग्य नाटककार आदि के रूप में वह इतिहास के पृष्ठों में एक प्रतिभावान और चित्ताकर्षक व्यक्ति

सर्वश्री डॉ. आर. सी. मजूमदार, डॉ. राय चौधरी और दत्त ने हर्ष का संक्षिप्त अरि सुदर मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि वह निसन्देह प्राचीन भारत के सबसे बड़े राजाओ। में से एक था। संकट काल में दो आतंकित राज्यों पर शासन करने के लिए वह बुलाया गया। लेकिन वह बहुत अंश तक उत्तरी भारत के विस्तृत क्षेत्रों में अपने आधिपत्य को स्थापित करनेमें सफल हुआ तथा न्यायदानी और कर्तव्य पारायण होकर यश कमाया। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वर्षों की कठिन लड़ाई ने उसे सुदृढ़ नींव पर नियमित सरकार की स्थापन नहीं करने दिया। जिसे गुप्त वंश की तीन पीढ़ियों के राजाओं ने मध्य देश में स्थापित किया। वा और जिससे होने वाले लाभों का वर्णन फाह्यान ने हदय से किया है। फिर भी इसे हम शिथिलता का परिणाम नहीं कह सकते। यह घर- घर न्याय लाने के लिए अथक चिन्तित था। अपने सम्पूर्ण राज्य में निरीक्षण के लिए वह भ्रमण करता था। दुष्टात्मा को दण्ड तथा पुण्यात्मा को पुरस्कार देने के लिए सर्वत्र प्रस्तुत रहता था। किन्तु उसके हृदय में इससे भी ऊंची महत्त्वाकांक्षा वर्तमान थी। गुप्त राजकुमारी के पौत्र हर्ष ने समुद्रगुप्त की साम्राज्यवादी स्मृतियों को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया और उत्तर तथा दक्षिण भारत को एक राजदण्ड के अधीन करना चाहा। उसका यह प्रयत्न बेकार साबित हुआ। किन्तु कन्नौज की राजकीय समृद्धि जिसे बनाने के लिए उसने इतना प्रयत्न किया। आने वाले युग में भी शायद की मलिन हुई और भारत के सुदूरतम भागों के राजा ‘महोदय श्री प्राप्त करने अर्थात् कन्नौज (महोदय) जीतने में सबसे बड़ा गौरव समझते थे। हर्ष ने भी साहित्य और शान्ति की कलाओं की ओर अपनी रुचि प्रदर्शित की जो विद्वान् समुद्रगुप्त की याद दिलाता है। अपने राज्य काल के पिछले दिनों में शायद अनजाने ही, अपने महान् अशोक का अनुकरण करना चाहा और चीनी तीर्थ यात्रा जातिगत और साम्प्रदायिक भावना से भरे उसके धार्मिक वृद्धि प्राप्त प्रतिष्ठानों, सहिष्णुता, उदारता और दान का साक्षी है। एक यूरोपीय लेखक उसे हिन्दू काल का अकबर कहता है वह एक महान् सेनापति और निष्पक्ष शासक तो था ही लेकिन वह धर्म और विद्वान् संरक्षक के रूप में इन सबसे बढ़कर था। उसने बाण, मयूर, दिवाकर और ह्वेनसांग जैसी श्रेष्ठतम् प्रतिभाओं और पवित्रतम ऋषियों को अपने पास इकट्ठा कर लिया था। एक विचार से वह समुद्रगुप्त की अपेक्षा अधिक भाग्यशाली था। क्योंकि उसके लिखे हुए लेख कुछ साहित्यिक ग्रंथ, अनुश्रुति के अनुसार अभी भी हम लोगों को प्राप्त हैं।”

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