दशा सम्बंधों से आप क्या समझते हैं विबिन्दु वर्गीकरण पद्धति में वर्णित इनके प्रकारों एवं स्तरों का विवेचन किजिए

 दशा सम्बंधों से आप क्या समझते हैं विबिन्दु वर्गीकरण पद्धति में वर्णित इनके प्रकारों एवं स्तरों का विवेचन किजिए

अन्त में अभ्यासार्थ प्रश्न एवं विस्तृत अध्ययन के लिए ग्रंथ सूची दी गयी है । 8. अभ्यासार्थ प्रश्न 1. । 2. डी डी सी एवं यू डी सी में प्रयुक्त दशा सम्बन्धों का उदाहरण सहित वर्णन एवं
विवेचन करें । 9. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथ सूची 1. Ranganathan, S. R., Prolegomena to Library Classification, Ed 3,
Banglore, Sarad Ranganathan Endowment for Library Science, 1976 2. Krishan Kumar, Theary of Classification, Ed. 4, New Delhi,
Publishing House, 1988 3. चंपावत, जी. एस., पुस्तकालय वर्गीकरण के सिद्धान्त, जयपुर, आर.बी.एस.ए. पब्लिशर्स, 1993
पुस्तकालयाध्यक्षों के लिये सांख्यकी
→ पुस्तकालयाध्यक्ष → झुकाव (विषय का)
→ सांख्यकी इसी से मिलता जुलता प्रयोग -088 एवं -089 के अन्तर्गत भी देखने को है । कुछ सीमित मात्रा में उपकरण दशा सम्बंध के उदाहरण भी देखने को मिलते हैं । जैसे – 15 वैज्ञानिक सिद्धान्त 676.10154 कागज और लुगदी का रसायन यहाँ 676.1 कागज में -015 को तालिका 1 के मानक उपविभाजन से लिया गर्व है ।। -015 के नीचे दिये निर्देशानुसार इसमें 540 से 4 अंक को लेकर जोड़ दिया गया है । यहाँ – 015 का प्रयोग कुछ हद तक उपकरण विधि के रूप में किया गया है । इस प्रावधान के अनुसार -015 में केवल 510-590 के बीच के अंक ही जोड़े जा सकते हैं ।
दो देशों के मध्य सामान्य सम्बन्धों को दर्शाने का भी प्रावधान मुख्य सारणी में;कहींकहीं देखने को मिलता है । जैसे 327.43 0 5491 भारत-पाक विदेश सम्बंध 382.954 0 5492 भारत-बांग्लादेश व्यापार समझौत 338.9173

 अफगानिस्तान को अमरीकन आर्थिक सहायता

उपर्युक्त सभी उदाहरणों में 0 (शून्य) का प्रयोग कर दो देशों के सम्बन्ध को दर्शाया गया है । यह सब इयूई डेसीमल क्लैसिफिकेशन में दिये निर्देशानुसार है । जहाँ कहीं भी ऐसा प्रावधान है, वर्गीकार दो देशों को जोड़ सकता है । लेकिन यदि सारणी में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं हो तो वर्गीकार ऐसा करने में असमर्थ रहता है ।।
यूनीवर्सल डेसीमल क्लैसिफिकेशन में भी दशा सम्बंधों को प्रदर्शित किया गया है । कोलन क्लैसिफिकेशन की भाँति इन सम्बन्धों को प्रदर्शित करने के लिए अलग सम्बंध संकेत चिन्हों का प्रयोग तो इसमें नहीं हुआ है परन्तु इन सभी सम्बंधों को प्रदर्शित करने का एक मात्र योजक चिन्ह :(कोलन) का इसमें प्रयोग किया गया है । पुस्तक में वर्णित दो विषयों में से किसी भी पक्ष को :(कोलन) के पहले अथवा बाद में दिये जाने का विकल्प है । लेकिन यदि ::(दुहरे कोलन) का प्रयोग किया गया है तो वर्गीकार के पास विषयों के अनुक्रम को बदलने का विकल्प नहीं रहता । जैसे: 31:63 कृषि के आँकड़े 63:31 कृषि के आँकड़े 341:63 (44:45) फ्रास और इटली के बीच मध्यस्तता 341:63 (45:44) इटली और फ्रांस के बीच मध्यस्तता 341:16:001 यूनेस्को

इकाई – 6: सर्वसामान्य एकल (Common Isolate) उद्देश्य

1. सर्वसामान्य एकलों से परिचय करवाना 2. सर्वसामान्य एकलों की अभिधारणा की अन्य नामों से अभिव्यक्ति से अवगत कराना, 3. पुस्तकालय वर्गीकरण की विभिन्न पद्धतियों में सर्वसामान्य एकलों के प्रयोग से परिचय करवाना । संरचना / विषय वस्तु
1. विषय प्रवेश 2. डी डी सी में प्रयुक्त सर्वसामान्य एकल 3. यू डी सी में प्रयुक्त सर्वसामान्य एकल 4. कोलन क्लैसिफिकेशन में प्रयुक्त सर्वसामान्य एकल 5. सारांश 6. अभ्यासार्थ प्रश्न | 7. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1 विषय प्रवेश ।
सर्वसामान्य एकल वे एकल हैं जिनका प्रयोग विभिन्न विषयों में सदैव एक जैसे अर्थ में ही होता है। पुस्तकालय विज्ञान वाङ्गमय में इन्हें अनेक नामों से जाना जाता है। जैसे रूप विभाजन, सामान्य उपविभाजन, मानक उपविभाजन, सामान्य सहायक, सामान्य एकल, सर्वसामान्य एकल आदि।
सर्वसामान्य एकल की परिकल्पना सर्व प्रथम पुस्तकालय वर्गीकरण के जनक मेलविल इयूई ने सन् 1885 में की थी। डेसीमल क्लैसिफिकेशन (Decimal Classification) नाम से विख्यात अपनी इस मौलिक कृति के वितीय संस्करण में उन्होने ‘रूप विभाजन’ (Form Division) नाम से इनका समावेश किया। 12वें(1927) संस्करण तक इन ‘रूप विभाजनों को इसी नाम से जाना जाता रहा। 13वें संस्करण में इन्हें सर्वसामान्य उपविभाजन (Common Sub-Division) की संज्ञा दी गई। 14वें संस्करण में इन्हें “एकीकृत उप-विभाजन” (Uniform Sub-Division) नाम दिया गया । 15वें (1952) एवं 16वें (1958) संस्करण में इन्हें पुन: “रूप विभाजन” (Form Division) नाम से सम्बोधित किया गया। 17वें(1988) संस्करण से लेकर अब तक इन्हें ‘मानक उप-विभाजन’ (Standard Sub-Division) के नाम से पुकारा जाता है। गिनती की दृष्टि से 13वें संस्करण में इनकी कुल संख्या मात्र 9 थी जो 16वें संस्करण में बढ़कर 70 हो गई। 17वें संस्करण में इनकी संख्या 74 हो गई। 18वें संस्करण में ये बढ़कर 112 हो गये। 19वें (1979) में 4 और नये उपविभाजन जोड़े गये जिससे ये बढ़कर116 हो गये। नवीनतम 21वें (1996) संस्करण में ऐसे 200 से अधिक मानक उप-विभाजनों की पहचान की गई है। जिनका समावेश प्रथम खण्ड के पृष्ठ 5 से 33 के अन्र्तगत किया गया है। सात तालिकाओं में से पहली तालिका का प्रयोग वर्गकार अपनी स्वेच्छा से करने को स्वतन्त्र है। लेकिन दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी एवं सातवीं, तालिका का प्रयोग सारणी में दिये निर्देशन के आधार पर ही किया जा सकता है।

2. इयूई डेसीमल क्लैसिफिकेशन में प्रयुक्त सर्वसामान्य एकल

प्रथम तालिका में प्रदर्शित कुछ प्रमुख मानक उपविभाजन इस प्रकार हैं:-01
दर्शन एवं सिद्धान्त (Philosophy and Theory) -015
वैज्ञानिक सिद्धान्त (Scientific Principles) -016
ग्रंथ सूची (Bibliography) मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त
विविध -0212
परिसूत्र -0218
सूची पत्र -0218
मानक -024
वृति विशेष के अध्यावसायियों के लिए विषय -028
निदेशिकायें -0272
पेटेन्ट्स -0285
कंप्यूटर अनुप्रयोग -0288 रखरखाव एवं मरम्मत -03
शब्द कोश -04
विशिष्ट प्रकरण
पत्रिकायें -06
संस्थायें एवं प्रशासन -0601 अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें -6030609 राष्ट्रीय, प्रादेशिक एवं क्षेत्रीय संस्थायें -07
शिक्षा, अनुसंधानपरक प्रकरण -08
व्यक्तिपरक विवरण -09
ऐतिहासिक, भौगोलिक, व्यक्तिपरक निरूपण उदाहरण 020.2354 भारत में पुस्तकालय विज्ञान: व्यवसाय के रूप में
पुस्तकालय विज्ञान: दर्शन एवं सिद्धान्त 016.3310954 भारतीय श्रमिक अर्थशास्त्र: एक कहानी 530.08202 महिला भौतिक शास्त्रियों के आंकड़े -05 020.1 79

3. यूनिवर्सल डैसीमल क्लैसिफिकेशन में प्रयुक्त सर्वसामान्य एकल ।

| इयूई डेसीमल क्लैसिफिकेशन के आधार पर विकसित यूनीवर्सल डेसीमल क्लैसिफिकेशन (1895) में ‘सर्वसामान्य एकल’ को सामान्य सहायक (Common Auxiliaries) की संज्ञा दी गई है । इस पद्धति में ऐसे सर्वसामान्य अभिलक्षणों की पहचान की गई जो अनेक विषयों से सम्बंधित पाये गये । इनको अभिलक्षणों के आधार पर अलग-अलग तालिकाओं में रखा गया । आवश्यकतानुसार इन्हें किसी भी विषय के साथ जोड़ा जा सकता था। जैसे –

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