इलैक्ट्रॉनिकी [P1] ‘ब्रॉडकास्टिंग’ एवं ‘इलैक्ट्रानिकी’

इलैक्ट्रॉनिकी [P1] ‘ब्रॉडकास्टिंग’ एवं ‘इलैक्ट्रानिकी’

 डॉ.एस.आर. रंगनाथन ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन इसीलिये किया था कि किसी विषय से जुड़े ऐसे दो पक्ष जिनका सम्बन्ध गाय-बछड़ा जैसे लगे, उसे उसी क्रम में व्यवस्थित करना चाहिए | जिस प्रकार एक नवजात बछड़ा गाय के बिना नहीं रहता उसी प्रकार किसी भी ऐसे विचार एकल को सदैव उस विचार एकल के साथ ही व्यवस्थित करना चाहिये जो उसका अभिन्न अंग लगता हो । जैसे |
? ‘ब्रॉडकास्टिंग’ [P2]
?  यद्यपि दो अलग-अलग पक्ष हैं परन्तु यहाँ ‘ब्रॉडकास्टिंग पक्ष’ तब तक नहीं लाया जा सकता जब तक कि ‘इलैक्ट्रानिकी पक्ष’ न दिया गया हो | यह परिस्थिति ठीक वैसी है जैसे कि एक दूध मुंहे गाय के बछड़े की होती है । वह सदैव अपनी माँ के साथ लगा रहता है । इसी धारणा को ध्यान में रखते हुए इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था । 4.4 क्रियावस्तु-क्रियाकर्ता-उपकरण सिद्धान्त (Actend-Action-Actor-Tool Principle) | इस सिद्धान्त का प्रयोग एक ऐसी स्थिति में किया जाता है जहाँ चार पक्ष अ (क्रियावस्तु) ब (क्रिया) स (कर्ता) द (उपकरण) हों । यदि ब पक्ष अपनी क्रियाशीलता अ पक्ष पर स पक्ष के द्वारा ‘द’ पक्ष के साथ प्रदर्शित कर रहा हो तो इस सिद्धान्त का प्रयोग कर इन चार पक्षों का अनुक्रम अ, ब, स, द, के क्रम में होगा । अन्य शब्दों में कह सकते हैं कि प्रभावित होने वाला पक्ष सर्वप्रथम रखा जायेगा । तत्पश्चात् क्रिया (Action) पक्ष लाया जायेगा । कर्ता (Actor) तृतीय पक्ष रहेगा और चौथा पक्ष उपकरण (Tool) रहेगा ।

विषयों को उनके निरूपण के आधार पर कितने वर्गों में रखा जा सकता है? स्पष्ट करें

इसी सिद्धान्त से मिलता जुलता एक अन्य सिद्धान्त भी है जिसे Commodity-Raw Material-Transformation-Transformer नाम दिया गया है । इसमें भी चार पक्ष दर्शाये गये है । इनका क्रम भी उसी प्रकार रहता है जिस प्रकार क्रिया वस्तु-क्रिया-कर्ता-उपकरण पक्षों का । उपरोक्त सभी उदाहरण ऐसे है जो मुख्य वर्ग (Basic Class) और व्यक्तित्व [P] पक्ष व ऊर्जा पक्ष [E] के विभिन्न स्तरों एवं आवर्तनों का क्रम सुनिश्चित करते हैं पर यदि किसी विषय में पद्धति (System), विशिष्ट (special) और व्यक्तित्व तीनों पक्ष विद्यमान हो तो उनका क्रम इस प्रकार होगा: पद्धति ने विशिष्ट व्यक्तित्व पक्ष । इन तीनों के बीच एक कौमा देकर एक को दूसरे का स्तर बना दिया जाता है ।
5 सारांश
इस इकाई में सरल वर्ग, यौगिक वर्ग एवं जटिल वर्ग को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, पक्ष विश्लेषण एवं पक्ष अनुक्रम की अभिधारणाओं की विस्तार से चर्चा की गयी है । पक्ष अनुक्रम के विभिन्न सिद्धांतों-भित्ति-चित्र सिद्धांत, समग्र अंग सिद्धांत, गाय-बछड़ा सिद्धांत, एवं क्रियावस्तु-क्रियाकर्ता-उपकरण सिद्धांत को उदाहरण सहित समझाया गया है । इकाई के अन्त में अभ्यासार्थ प्रश्न एवं विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची भी दी गयी है । 6. अभ्यासार्थ प्रश्न

पक्ष विश्लेषण की परिभाषा करते हुये वर्गीकरण में इसके महत्व को समझाइये 

 4. पक्ष अनुक्रम की अभिधारणाओं का विवेचन करें । 5. पक्ष अनुक्रम के सिद्धान्तों का स्पष्टीकरण करें ।
7. विस्तृत आध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. Ranganathan, S. R., A descriptive account of colon classification,
Bombay, Asia Publishing House, 1965 2. Krisan Kumar, Theory of Classification, Ed 4, New Delhi, Vikas
Publishing House, 1998 3. चंपावत, जी. एस, पुस्तकालय वर्गीकरण के सिद्धान्त. जयपुर, आर.बी.एस.ए. पब्लिशर्स
1993.
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इकाई – 5 : दशा सम्बंध (Phase Relations)
उद्देश्य
1. विषय के विभिन्न पक्षों / आयामों की जानकारी प्राप्त करना, 2. विषयों के मध्य विभिन्न प्रकार के दशा सम्बंधों से परिचय प्राप्त करना,
3. दशा सम्बंधों के विभिन्न स्तरों से परिचित होना । संरचना/ विषय वस्तु
1. विषय प्रवेश 2. दशा सम्बंध 3. अन्त: विषयी दशा सम्बंध 4. अन्त: पक्ष दशा सम्बंध 5. अन्त: पंक्ति दशा सम्बंध 6. इयूई डेसीमल एवं यूनिवर्सल क्लैसिफिकेशन में दशा सम्बन्ध का प्रयोग 7. सारांश 8. अभ्यासार्थ प्रश्न
9. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. विषय प्रवेश | यह आवश्यक नहीं कि पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय एक पक्षीय अथवा एक आयामी ही हो, वह बहु पक्षीय एवं बहु आयामी भी हो सकता है । विषय का निरूपण सरल भी हो सकता है और गूढ़ भी । वह यौगिक भी हो सकता है । और जटिल भी हो सकता है । सूचना के क्षेत्र में हुए विस्फोट के फलस्वरूप अब अधिकांश विषय किसी न किसी रूप में अन्य विषयों से जुड़े पाये जाने लगे हैं । ज्ञान की इन इकाइयों के मध्य विभिन्न प्रकार के सम्बंधों को देखा जा सकता है । इन इकाइयों के पक्षों के बीच सम्बन्ध की अवधारणा को डा. एस. आर. रंगनाथन ने ‘दशा सम्बंध’ की संज्ञा दी है ।

कोलन क्लैसिफिकेशन में वर्णित विषय विश्लेषण की प्रक्रिया को स्पष्ट करें

इस प्रकार (अ) दो मुख्य वर्गों के मध्य; (ब) एक वर्ग के किसी पक्ष के दो एकलों के मध्य; (स) एक वर्ग के पक्ष के दो श्रृंखला एकलों के मध्य पाये जा सकते हैं । किसी भी वर्गीकरण पद्धति में दशा सम्बंधों का सर्वप्रथम प्रावधान इसलिये किया जाता है जिससे कि यौगिक (Compound) एवं जटिल (Complex) विषय प्रकरणों को वैयक्तिकता प्रदान की जा सके । डा.एस.आर. रंगनाथन ने शिथिल समुच्चय (Loss Assemblage) की प्रक्रिया से गठित विषयों को वर्ग संख्या प्रदान करने के लिये दशा सम्बंधों की अभिकल्पना की ।
यूनीवर्सल डेसिमल क्लैसिफिकेशन में दो या दो से अधिक पक्षों वाले विषयों के जोड़ने के लिए कोलन चिन्ह का प्रयोग किया गया था । इस तकनीक के अपनाने से इस पद्धति की ग्राह्यता और लोकप्रियता में असीम वृद्धि हुई और विश्व के अनेक पुस्तकालयों में इसे अपनाया जाने लगा ।

2. दशा सम्बन्ध –

दशा सम्बंधों का विधिवत प्रयोग हमें कोलन क्लैसिफिकेशन के प्रथम संस्करण (1933) में देखने को मिलता है। मद्रास विश्वविद्यालय ग्रंथालय के संग्रह को वर्गीकरण करने के दौरान डा. एस.आर. रंगनाथन को ऐसे अनेक विषय ग्रंथ मिले जिनका सृजन किसी विशिष्ट विषय वर्ग में पाठकों की अभिरूचि या आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया गया था। ऐसे दो विषय वाले ग्रंथों में वर्ग निर्माण के लिए उन्होंने दशा कड़ी (Phase Link) तकनीक का प्रयोग किया और उन दो विषयों के बीच ‘शून्य’ को दशाकड़ी के रूप में प्रयुक्त किया, जैसे:
BOD अभियांत्रिकों के लिए गणित B2802 पुस्तकालयाध्यक्षों के लिए सांख्यकी
इन दो उदाहरणों में हम देखते हैं कि प्रथम ग्रंथ में गणित का निरूपण अभियांत्रिकों की दृष्टि से किया गया है 

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