अन्तिम आवर्तन में पक्षक्रम की अभिधारणा (Postulate of facet Sequence within last round)

अन्तिम आवर्तन में पक्षक्रम की अभिधारणा (Postulate of facet Sequence within last round)

यहाँ कपास [P] व्यक्तित्व पक्ष है भूमि [M] पदार्थ पक्ष है, और तैयारी [E] ऊर्जा पक्ष है। तीनों पक्षों का क्रम भी यही होना चाहिये। इस प्रकार की अभिधारणा को एक आवर्तन में पक्षक्रम की अभिधारणा कहा जाता है।
इस अभिधारणा का आशय यह है कि जिस विषय में ऊर्जा [E] पक्ष के अतिरिक्त अन्य सभी मूलभूत श्रेणियाँ उपस्थित हो वहाँ वे सभी एक बार में ही प्रदर्शित कर दी जाती है।
उनका क्रम [P] [M] [S] [T] के अनुक्रम में रखा जायेगा । उदाहरण स्वरूप ’19वीं सदी की ब्रिटिश स्वर्ण मुद्रा में 19वीं सदी ‘कालपक्ष’ [T] का द्योतक है, ब्रिटिश ‘स्थानपक्ष’ [S] का द्योतक है, स्वर्ण मुद्रा पदार्थ पक्ष [M] का द्योतक है । इन सब का क्रम प्रदत्त अभिधारणा के अनुसार [P] [M] [S] [T] रहेगा।
कोलन क्लैसिफिकेशन में [P] [M] [E] [S] [T] का क्रम सुनिश्चित किया गया है । व्यक्तित्व पक्ष पदार्थ पक्ष से अधिक मूर्त है | पदार्थ पक्ष ऊर्जा पक्ष से अधिक मूर्त है । ऊर्जा पक्ष स्थान पक्ष से अधिक मूर्त है । स्थान पक्ष काल पक्ष की तुलना में अधिक मूर्त है । इसी को ध्यान में रखकर [P] [M] [E] [S] [T] का क्रम सुनिश्चित किया गया है । इस प्रकार किसी भी विषय के विभिन्न पक्षों को निम्नवत व्यवस्थित करेंगे:
(BC) [P]; [M]; [E]. [S] [T]

3.5 स्तर समूह की अभिधारणा (Postulate of Level Cluster)

इस अभिधारणा का आशय यह है कि किसी भी मूलभूत श्रेणी से सम्बन्धित उसके किसी भी आवर्तन में विद्यमान स्तरों को एक साथ रखा जाना चाहिये । एक मूलभूत श्रेणी के एक आवर्तन के समस्त स्तरों के बाद ही अन्य मूलभूत श्रेणियों के एकलों को व्यवस्थित करना चाहिये । जैसे:| D6_6, 2 1 : 7. 44. g7 भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में व्योमस्थ विद्युत के प्रेषण का निर्माण कार्य → (Mountain) पर्वत → (India) भारत → (Asia) एशिया → (Construction) निर्माण → (Indicator digit for [E] का संकेत चिन्ह 4 (Over head) व्योमस्थ → (Transmission) प्रेषण (Indicator Digit for [P2]) का संकेत चिन्ह → (Electrical) deya – (Mechanical Engg.) यांत्रिक अभियांत्रिकी – (Engineering) मुख्य वर्ग अभियांत्रिकी इस उदाहरण में मुख्य वर्ग D अभियांत्रिकी के दो स्तर विद्यमान है । पहला स्तर वैद्युत अभियांत्रिकी (Electrical Engineering) है । और दूसरा स्तर व्योमस्थ प्रेक्षण (Overhead Transmission) है । व्योमस्थ प्रेषण का स्वयं में कोई अस्तित्व नहीं है । यह वैद्युत अभियांत्रिकी पर निर्भर कर रहा है । अतः मुख्य वर्ग D अभियांत्रिकी के पश्चात् ‘वैद्युत अभियांत्रिकी’ और तत्पश्चात ‘व्योमस्थ प्रेषण’ को क्रमबद्ध किया गया है । चूंकि इस शीर्षक में व्यक्तित्व पक्ष के मात्र दो ही स्तर विद्यमान है अतः इन्हें देने के उपरान्त ऊर्जा पक्ष [E] को क्रमबद्ध कर दिया गया है। इस शीर्षक में मूलभूत श्रेणी प्रदार्थ [M] अनुपस्थित है अत: इसे नहीं दर्शाया गया है । ऊर्जा पक्ष के उपरान्त स्थान पक्ष [S] विद्यमान है । इसके भी दो स्तर दृष्टिगोचर हो रहे हैं । प्रथम स्तर [S] का निर्धारित अंक देने के बाद ही इसके दूसरे स्तर पर्वतीय [S2] क्षेत्र को क्रमबद्ध किया गया है ।

4. पक्ष अनुक्रम के सिद्धान्त (Principles of Facet Sequence)

एक यौगिक विषय की विभिन्न मूलभूत श्रेणियों के पक्षों को अनुकूल क्रम प्रदान करने में मुर्तता ह्रास अभिधारणा’ अत्याधिक सहायक सिद्ध हुई है परन्तु एक ही मूलभूत श्रेणी के एक से अधिक पक्षों को अनुकूल क्रम प्रदान करने में यह अभिधारणा असमर्थ है । अत: एक ही मूलभूत श्रेणी के एक से अधिक पक्षों को सहायक क्रम प्रदान करने के लिये डॉ. एस.आर. रंगनाथन ने पक्ष अनुक्रम के सिद्धान्तों (Principles of Facet Sequence)का प्रतिपादन किया । ये सिद्धान्त इस प्रकार है:
भित्ति-चित्र सिद्धान्त (Wall Picture Principle) समग्र अंग सिद्धान्त (Whole Organ Principle) गाय-बछड़ा सिद्धान्त (Cow- Calf Principle) क्रियावस्तु-क्रियाकर्ता-उपकरण सिद्धान्त (Act end- Action-Actor-Tool Principle)

 4.1 भित्ति चित्र सिद्धान्त

| इस सिद्धान्त का सृजन सन् 1962 में एक ही मूलभूत श्रेणी से संबंधित एक से अधिक एकलों को अनुकूल क्रम प्रदान करने के लिये डा. रंगनाथन ने किया था । इस सिद्धान्त के अनुसार एक एकल को भित्ति और दूसरे एकल को चित्र के रूप में देखा जाता है | चित्र को टाँगने के लिये आवश्यक है कि भित्ति का अस्तित्व पहले हो । अन्यथा चित्र को टांगा नहीं जा सकता । अतः उस पक्ष को प्राथमिकता देनी चाहिये जो दूसरे के लिये आधार बन सके । कोलन क्लैसिफिकेशन में इस सिद्धान्त का प्रयोग खुलकर किया गया है । उदाहरण के लिये छठे संस्करण में मुख्य वर्ग L आयुर्विज्ञान में मूलभूत श्रेणी ऊर्जा के दो आवर्तन हैं । पहला आवर्तन रोग का है और दूसरा आवर्तन उससे जुड़े निदान, उपचार का है । यहाँ दोनों के लिये L : 4 → उपचार [2E] → रोग [E]
→ आयुर्विज्ञान [BC] क्रम सुनिश्चित किया गया है । भाव यह है कि उपचार रोग की अनुपस्थिति में हो सकता । अतः आवश्यक है कि उपचार (चित्र) के लिए रोग (भित्ति) का प्रावधान हो । इसी प्रकार के उदाहरण मुख्य वर्ग । वनस्पति शास्त्र, । कृषि, K प्राणिशास्त्र, KX पशुपालन Y समाजशास्त्र में भी मूलभूत श्रेणी ऊर्जा के दो आवर्तनों के मध्य देखे जा सकते हैं । जैसे
→ रोकथाम (Prevention) [2E] → अपराध (Crime) [E] → शहरी (Rural) [P]
→ समाजशास्त्र (Sociology) [BC] यहाँ ‘रोकथाम’ का एकल ‘अपराध’ का एकल दिये जाने के बाद ही लाया जा सकता है। यहाँ अपराध को भित्ति (Wall) और रोकथाम को चित्र (Picture) मानकर इन दो एकलों का पारस्परिक क्रम सुनिश्चित किया गया है ।

4.2 समग्र-अंग सिद्धान्त (Whole Organ principle)

समग्र-अंग सिद्धान्त एक प्रकार से भित्ति-चित्र सिद्धान्त के समान ही है । दोनों में भिन्नता इतनी भर है कि समग्र- अंग सिद्धान्त का अनुप्रयोग तभी किया जाता है जबकि ‘समस्त’ और ‘अंग’, का बोध होता हो । व्यक्तित्व पक्ष में यदि एक से अधिक स्तरों की उपस्थिति हो तो समग्र-अंग सिद्धान्त का सहारा लिया जा सकता है । जैसे:V 44,1 भारत का राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष [P2] का द्योतक
→ भारत [Pl] का द्योतक यहाँ पर ‘राष्ट्रपति’ को अंग के रूप में मानकर समग्र ‘भारत’ के पश्चात् जोड़ा गया है

4.3 गाय-बछड़ा सिद्धान्त (Cow- Calf Principle)

विषय के ऐसे दो पक्ष जो एक दूसरे से ऐसे जुड़े हों कि अलग-अलग होने पर भी उनको अलग-अलग न किया जा सके तो ऐसी स्थिति में गाय-बछड़ा सिद्धान्त अनुक्रम का सहारा लिया जाता है । 

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