पुस्तकालय प्रसूची का पूर्वव्यापी रूपान्तरण (Retrospective Conversion of Library Catalog) से आप क्या समझते है ?

पुस्तकालय प्रसूची का पूर्वव्यापी रूपान्तरण (Retrospective Conversion of Library Catalog) से आप क्या समझते है ?

आधुनिक समय में प्रलेखन सेवा का अत्यधिक महत्व है । पुस्तकालय के गृहकार्य में कंप्यूटर के अनुप्रयोग ने इस कार्य को सुगम बना दिया है । प्रलेखन सेवा के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित गतिविधियाँ आती हैं।
(क) नव अधिगृहीत पुस्तक सूची
(ख) सूचना का चयनित संप्रेषण आशय, आवश्यकता
(ग) वाङ्गमय सूचियाँ बनाना
उपरोक्त कार्यों को कंप्यूटर की मदद से सुगमता पूर्वक अल्प समय में सम्पन्न कर लिया जाता है । कंप्यूटर से कम्प्यूटर को प्राप्त कर सूचना का चयनित संप्रेषण कार्य भी आसानी से किया जाता है । इस प्रकार मांग आने पर आवश्यकतानुसार चयनित विषय के अन्तर्गत आने वाले प्रलेखों को एक फाइल के रूप सेव कर तथा मुद्रित कर वाङ्गमय सूची प्राप्त की जा सकती है। कंप्यूटर अनुप्रयोग से पाठकों को बेहतर सेवा प्रदान की जा सकती है।
हस्तकार्य से बनायी गयी अनुक्रमणिका या सूची में कई स्थानों पर सूचना किन्हीं कारणों से सम्मिलित नहीं हो पाती । परन्तु कंप्यूटर पाठक द्वारा वांछित सूचना उसके विश्लेषण सहित उसकी सटीक एवं सुविस्तृत खोज कर उसकी पुनःप्राप्ति कराता है । सूचना का भंडार चाहे जितना बड़ा हो, कंप्यूटर द्वारा वांछित सूचना की खोज आसान हो जाती है ।

6.3 कंप्यूटर के अन्य अनुप्रयोग।

पुस्तकालय एवं सूचना सेवाओं के अलावा कंप्यूटर के अनुप्रयोग बहुतायत में हो रहे हैं । आज कंप्यूटर पर होने वाला 80 प्रतिशत कार्य व्यावसायिक तथा गृहकार्य की श्रेणी में आता है। । बैंकिग, उद्योग, अन्तरिक्ष विज्ञान, दूर संचार, इंजिनियरिंग डिजाइन, यातायात, रेलवे, टेलीफोन व टेलिग्राम, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में कंप्यूटर का अनुप्रयोग अपनी उपयोगिता प्रमाणित कर चुका है । आजकल अनेक कंप्यूटर निर्माता अपने कंप्यूटरों को घरेलू उपयोग के लिए ला रहे है । घरेलू उपयोग में घर का बजट आदि तैयार करने, मनोरंजन के साधन के रुप में, पत्र लेखन में इसकी महत्वपूर्ण उपयोगिता है ।

6.3.1 पुस्तकालय प्रसूची का पूर्वव्यापी रूपान्तरण (Retrospective Conversion of Library Catalog)

पूर्वव्यापी (Retropective) का अर्थ है जो पहले से अस्तित्व में हो तथा रूपान्तरण का अर्थ है मशीन पठनीय स्वरूप में परिवर्तन । इन दोनों को संक्षेप में रीट्रोकन्वर्जन (retroconversion) कहते हैं । इस तरह पूर्वव्यापी रूपान्तरण, पुस्तकालय के सम्बन्ध में, का तात्पर्य हुआ, पहले से निर्मित अभिलेखों, जैसे प्रसूची, सदस्य अभिलेख, अधिग्रहण अभिलेख आदि का, मशीन-पठनीय स्वरूप में रूपान्तरण | रूपान्तरित सूचनाओं के रूपान्तरण से विशेष रूप से सम्बन्धित है । जेन बी ओमान्ट एण्ड जोसेफ पी. काक्स के अनुसार ‘पूर्वव्यापी रूपान्तरण पुस्तकालय के पहले से निर्मित पुस्तकालय अभिलेखों का हाथ सम्बन्धी कार्यक (मैनुअल) से मशीन पठनीय स्वरूप में, विशिष्ट नीतियों एवं मानकों के अनुसार रूप
नीतियों एवं मानकों के अनुसार रूपान्तरण है । पूर्वव्यापी रूपान्तरण प्रभावी पुस्तकालय स्वचालन (आटोमेशन) की पूर्व शर्त है । यह पुस्तकालय स्वचालन का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है । यह काफी कठिन खर्चीला एवं समय साध्य है ।
पूर्वव्यापी रूपान्तरण के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:
1. पुस्तकात्मक डेटाबेस का निर्माण
2. पुस्तक लेन-देन (Circulation) को स्वचालित बनाना,
3. संघसूची का निर्माण,
4. पुस्तकपरक सूचनाओं की सहभागिता,
5. संसाधन सहभागिता सुनिश्चित करना,
6. पुस्तकालय संग्रह का त्वरित एवं बहुआयामी सेवा के योग्य बनाना,
7. पाठक की अधिकतम सेवा एवं समय की बचत ।।

रूपान्तरण प्रक्रिया

डेटा रूपान्तरण प्रक्रिया आरम्भ करने के पूर्व हमें निवेशित खर्च का भली-भाँती आकलन कर लेना चाहिए । इस कार्य में आने वाली समस्याओं प्रबन्धकीय, वित्तीय, प्रशासनिक-दर उचित समय पर विचार कर निर्णय लेना चाहिए | मशीन पठनीय स्वरूप में किन-किन मानकों का पालन किया जाना है, यह पहले से सुनिश्चित कर लेना चाहिए तथा इस कार्य को पूरा करने की समय सीमा भी तय कर लेनी चाहिए | कंप्यूटर में रूपान्तरण प्रक्रिया शुरु करने के पूर्व ऐसे अभिलेखों प्रलेखों का चयन कर अलग कर देना चाहिए ।
| पूर्वव्यापी रूपान्तरण में मुख्यतः तीन चरण होते हैं । प्रथम चरण में वर्तमान सूची के अभिलेखों का कंप्यूटरीकृत पुस्तकात्मक डेटाबेस जैसे OCLC, लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस डेटाबेस से मिलान कर लेना चाहिए । मिलान में समान पाये गये अभिलेखों की जाँच तथा उनका सम्पादन दवितीय चरण में होता है । पद्धति का ध्यान रखकर आवश्यक परिवर्तन किया जाता है ।
रूपान्तरण के तृतीय चरण में असमान पाये गये अभिलेखों को सीधे कंप्यूटर में निवेश की आवश्यकता होती है । प्रत्यक्ष डेटा निवेश के कई विकल्प होते हैं:
प्रसूची (प्रायः फलक सूची)
– भौतिक रूप से पुस्तकों की सहायता से। – परिग्रहण पंजी की मदद से ।
पूर्ण सूची अभिलेख न होने अध्या अद्यतन (Up-to-date) फलक सूची न रहने से पहला विकल्प लाभकारी नहीं होता । परिग्रहण पंजी से सम्पूर्ण आवश्यक सूचनाएँ पाना सम्भव नहीं रहता । इसलिए भौतिक रूप से पुस्तकों को फलक से मंगाकर सीधे कंप्यूटर में निवेश करना ज्यादा उपयोगी होता है ।
पुस्तकों की मदद से सीधे निवेश के कार्य के तीव्र गति से सम्पादन के लिए पुस्तकालय के नियमित कर्मचारियों के साथ-साथ संविदा पर अन्य योग्य लोगों को भी नियुक्त करना चाहिए । इस विधि से कार्य करने पर कार्य समय सीमा के अन्दर सम्पन्न होना सम्भव लगता है | ईटा निवेश के कार्यों में मानवीकरण तथा एकरूपता बनाये रखने के लिए वरिष्ठ व्यावसायिकों द्वारा इनकी नियमित जाँच तथा सम्पादन कार्य कराया जाना युक्तिसंगत है ।।

7. सारांश

| इस इकाई में पुस्तकालय स्वचालन का तात्पर्य, संक्षिप्त इतिहास के बारे में प्रकाश डाला गया है। पुस्तकालय का कंप्यूटरीकरण तथा आधुनिक पुस्तकालयों में कंप्यूटर की उपयोगिता बतायी गयी है । पुस्तकालय कंप्यूटरीकरण के क्षेत्र गृहकार्य सम्बन्धी गतिविधियाँ एवं पुस्तकालय सेवा पर विस्तार से चर्चा की गयी है । साथ ही कम्प्यूटर के अन्य अनुपयोग से भी अवगत करवाया गया है । 8. अभ्यासार्थ प्रश्न
1. पुस्तकालय स्वचालन की परिभाषा एवं महत्ता पर प्रकाश डालिये ।।
2. पुस्तकालय कंप्यूटरीकरण के विभिन्न क्षेत्र क्या है ? विस्तार से चर्चा कीजिए । 9. पारिभाषिक शब्दावली
गृहकार्य : (House keeping operation); पुस्तकालय सेवा प्रदान करने के लिए पुस्तकालयों को अपने को तैयार करने के लिए अनेक कार्य पर्दे के पीछे करने पड़ते है । पर्दे के पीछे या तैयारी स्वरूप किए जाने वाले इन कार्यो को गृहकार्य कहते है, जैसे आंतरिक प्रशासन, अधिग्रहण, अवाप्ति, तकनीकी प्रक्रिया (वर्गीकरण एवं प्रसूचीकरण), पत्र-पत्रिकाओं का नियंत्रण आदि ।।
पूर्वव्यापी रूपान्तरण (Retcroconvesion) : पुस्तकालय में पहले से किए जा चुके कार्यों या अभिलेखों – जैसे वर्गीकरण या प्रसूची – का मशीन पठनीय रूप में रूपान्तरण । । 10. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. Ramlingan Library Information Technology : (Concepts to Applications,
Kalpaz, Delhi 2000) 2. शंकर सिंह, कंप्यूटर और सूचना तकनीक, दिल्ली, पूर्वाचल प्रकाशन, 2000 3. शर्मा, पाण्डेय एस. के., कंप्यूटर और पुस्तकालय, दिल्ली, ग्रंथ अकादमी, 1996

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