Who were the Hunas? Discuss the part played by them in Indian history.

Who were the Hunas? Discuss the part played by them in Indian history.

चीनी यात्री शृंगयुन के अनुसार “गांधार का राजा अत्यन्त क्रूर स्वभाव का था । वह सन् 517 ई. से 520 ई. तक कश्मीर के राजा से लड़ता रहा।” ।
कॉस्मस नामक यूनानी लेखक ने अपनी पुतस्क में लिखा है कि “मिहिरकुल दो हजार हाथियों और बहुत बड़ी अश्वसेना का स्वामी था। उसने भारतीयों पर अत्याचार किया और उन्हें कर देने को विवश किया। उस समय हूणों का निजी प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम की ओर माना जाता था।”

(1) मिहिरकुल का राज्य विस्तार – 

मिहिरकुल एक पराक्रमी शासक था । ह्वेनसांग। के विवरण के अनुसार मिहिरकुल ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अपना अधिकार कर लिया था। तथा उसने गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए। विवश किया और अन्तत: इस सम्राट को अपने अधीन कर लिया । ह्वेनसांग अपने वर्णन में लिखता है कि नरसिंह गुप्त बालादित्य भी हूण सम्राट को कर देता था। गांधार पर भी उसका स्वामित्व था। मिहिरकुल की राजधानी शाकल (स्यालकोट) थी। सिकन्दरिया के कॉस्मास के अनुसार सिन्धु नदी हूण राज्य के पश्चिम में थी । सन् 530 ई. से एक अभिलेख में ज्ञात होता है कि उसका प्रभूत्व ग्वालियर तक फैला हुआ था। ऐसी सम्भावना बयत की ग्वालियर से आगे भी उसके प्रभुत्व को स्वीकार किया जाता था।
इस तरह उत्तराधिकार के रूप में मिहिरकुल को एक विस्तृत प्राय माना जाता है कि हण साम्राज्य का भारत तो एक प्रान्त मात्र था। इस विस्तृत अध्रा । एक राजधानी बल्ख तथा दूसरी राजधानी वामयान में थी। इन्हीं राजधानियों में साम्राज्य का शासन कार्य सम्पन्न किया जाता था। चालीस से भी अधिक देश 2 / रहते हुए उसे कर देते थे। गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य को भी उसने 4 2 ? विवश कर दिया था तथा मगध नरेश बालादित्य ने मिहिरकुल की सार्वभौमिक : 2 स्वीकार कर लिया था।

(2) मिहिरकुल की पराजय –

 बौद्धों की निर्मम हत्या और अपनी जान पराजय का बदला लेने के लिए बालादित्य ने पुन: एक प्रयास किया। उसने दिल कर देना बन्द कर दिया। बालदित्य के इस विद्रोह का दमन करने के लिए मिहिर ने शक्तिशाली सेना के साथ मगध की ओर प्रस्थान किया। गुर सम्राट नरसिंह 7 बालटिन्छ मगध की रक्षा करने में असमर्थ था। अत: वह बंगाल की खाड़ी में स्थित किसी द्वीप में चन्द्र गया और मिहिरकुल ने पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बालाटिन्छ । पीछा किया। बालादित्य सेना सहित एक द्वीप में घिर गया किन्तु उसने एक सदी घाट । आड़ में हूणों के छक्के छुड़ा दिये। इस तरह हुणों को पराजित किया। हेना हमें बताता है कि बालादित्य तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल को बन्दी बनाने में सल , किन्न राजमाता के कहने पर उसने उन्हें मुक्त कर दिया। इस हार के पश्चात् मिहिन न र में जाकर शरण ली। जहाँ उसने कश्मीर नरेश के आतिथ्य का अनुचित ला उठाकर इद्र पडयन्त्र रचा तथा अपने आश्रयदाता का ही राज्य हड़प लिया। कश्मीर पर वह अधिक दिन तक राज्य नहीं कर सका। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार उन केवल एक वर्ष तक राज्य किया।

कल्हण की राजतरंगिणी ह्वेनसांग  मिहिरकुल की पराजय

ह्वेनसांग ने गुप्त सम्राट द्वारा मिहिरकुल की पराजय का वर्णन इन शब्दों में किया है। “मगध नरेश बालादित्य राजा बुद्ध के नियम का अनन्य उपासक, था। जब उसन मिहिरन के अत्याचारों तथा नृशंसता के समाचार सुने तो उसने राज्य की सीमाओं का प्रत; युरक्षित कर लिया और शुल्क देने से इन्कार कर दिया। मिहिरकुल द्वारा अक्रमा करने पर बालादित्य ने अपनी सेना सहित एक द्वीप में आश्रम लिया। बालादित्य के सैनिकों ने उसका एक तरी दरे में पीछा किया और उसे बन्दी बना लिया। उसने मिहिरकुल को मारना चाहा किन्तु अपनी माता के आग्रह पर मुक्त कर दिया। वापिस लौटकर मिहिरकुल को ज्ञात हुआ कि उसका भाई वापिस लौट आया था और उसने सिंहासन पर अधिकार कर लिया था। अतः उसने कश्मीर में आश्रय लिया और वहा विद्रोह कराके राजा का वध करके स्वयं सिंहासन पर बैठ गया। उसने गांधार नरेश को भी समाप्त करके वहाँ के राजवंश को समाप्त किया। पी तथा संघारामों को नष्ट किया और देश की सम्पत्ति को लूटकर लौट गया किन्तु एक ही वर्षे में उसकी मृत्यु हो गई।

मिहिरकुल की पराजय एक विवादग्रस्त समस्या

मिहिरकुल की पराजय एक विवादग्रस्त समस्या बन गई हैं। इस बात पर इतिहासकारों मे काफी विचार भिन्नता है कि मिहिरकुरन की पराजय का श्रेय किसे दिया जाए। बालादित्य या यशाम को। चीनी यात्री हेनपांग ने अपने वर्णन में लिखा है कि गुप्त नरेश नरसिंह बालादित्य ने मिहिरकुल को पराजित किया। जबकि अभिलेख जिसमें कि मन्दसौर अभिलाद का लिया जा सकता है। इसके अनुसार यशोधर्मा ही मिहिरकुल को पराजित करने द्राला नरेश था । प्रसिद्ध इतिहासकार जिनमें कि डॉ. वी. ए. स्मिथ का नाम लिया जा सकता है। उनका कहना है कि मिहिरकुल की पराजय का श्रेय किसी एक को नहीं दिया जा सकता । मिडिल को पराजित करने के लिए दोनों ने आपस में सन्धि कर ली थी और दोनों के संयुक्त प्रयास से मिहिरकुल को पराजय का मुंह देखना पड़ा। फ्लीट महोदय का कहना है छि मिहिरकुल का पूर्व में बालादित्य ने और पश्चिम में यशोधर्मा ने पराजित किया ।
। मिहिरकुल का पहले किसने और बाद में किसने सम्बंधी विवाद को लेकर भी इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है। इस सम्बंध में हेरास का मत है कि मिहिरकुल को पहले यशोधर्मा ने पराजित किया और बाद में बालादित्य ने उसे पूर्णरूप से पराजित कर दिया। लछिन र छथन के विपरीत डॉ. राय चौधरी का कथन है कि मिहिरकुल पहले बालादित्य के हाथों पराजित हुआ और बाद में यशोधर्मा द्वारा । डॉ. वी. सी. पाण्डेय का कथन है कि *मालवा में यशाध का उदय हुआ और उसने अपनी दिग्विजय में गुप्त नरेश बालादित्य और हृया नरेश मिहिरकुल टानों को पराजित किया। दूसरे मन्दिर अभिलेख की तिथि 532 ई है। अत: अनुमान किया जा सकता है कि इस तिथि के पर्व ही मिहिरकुल यशोधर्मा द्वारा पराजित किया जा चुका होगा मन्दसौर अभिलेख का कथन है कि यशोधर्मा द्वारा पराजित ४ान है, पूर्व मिहिरकुल ने शिव भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी के सामने भी अपना सिर नई झुकाया था। इस कथन से यही स्पष्ट होता है कि मिहिरकुल को सर्वप्रथम यशोधर्मा ने राजित किया। इस विजय के पश्चात् यशोधर्मा की मृत्यु हो गई ।

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